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गोमाता विषनाशनी

           जा घर तुलसी अरु गाय, ता घर वैध्य कबहू जाय .

                  कहा है : जीवन्तु अवन्ध्या: ता में विषस्य दूषनिः

  अर्थ : अवध्य गौवें जीवित रहें, वे विष दूर करती है. आयुर्वेद में विषैले पदार्थों को गौमूत्र से ही शुद्ध किया जाता है.

             

     गौमुत्रे, त्रिदिनं, स्थाप्यय विषं तेन विशुध्यति”.

  यह गोमाता के विषय में एक विशेषता है.

  गाय के खाने में कभी विषैला या हानिकारक तत्व आ जाता है हो वह उसको उसके मांस में सोख लेती है तथा मूत्र, गोबर एवं दूध में उत्सर्जित नहीं करती है अथवा अति अल्प मात्रा में छोड़ती है. ऐसा अन्य पशुओं को पदार्थ देकर दूध व मूत्र परीक्षा करके जाँच में पाया गया है. इसीलिए गौमूत्र, पवित्र व गौमय, मल शोधक है. गौ दूध तो विषनाशक है ही, गौमूत्र का पंचगव्य में समावेश हुआ है. पंचगव्य को समस्त रोग नाशक कहा है.

           यत्वगस्थी, गतं, पापं देहे, तिष्ठति, मामके.

            प्राशनात, पंचगव्यस्य, दहस्यग्रिरीवेंधनं.

   अर्थ त्वचा से अस्थि तक, जो भी पाप (रोग) मेरे शरीर में हो, वे ऐसे नष्ट हो जाते है जैसे अग्नि से इंधन.

           

गौमूत्र का आयुर्वेद रीती से वर्णन, औषधि एवं उपयोगिता

  आयुर्वेद, वेदों से लिया, चिकित्सा का अंग है. वेद, ब्रह्मा मुख से कहे गए है. ब्रह्म वाक्य जनार्दनम है. इसलिए आप्तोपदेश कहा है. गौमूत्र प्रभाव से भी निरोग करता है. अचिन्त्य शक्तिइति प्रभाव कहा है. जिस शक्ति को चिंतन (वर्णन) नहीं किया जा सकता है, उसे प्रभाव कहते है. गौमूत्र के आयुर्वेद में गुण बताए है.